हिंदू पौराणिक शास्त्रों में ग्रहों, नक्षत्रों और राशियों के बीच संबंधों का व्यापक उल्लेख मिलता है। ग्रहों के आपसी संबंध का असर इंसान पर भी स्पष्ट रूप से होता है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने व्यापक जनहित में त्योहार और पर्व विशेष पर पूजा और दान आदि परंपराओं की व्यवस्था की जिससे आमजन ग्रहों के गोचर में होने वाले परिवर्तनों के कारण उससे होने वाले संभावित नुकसान से बच सकें।
मकर संक्रांति के अवसर पर किए जाने वाले दान-पुण्य की व्यवस्था के पीछे भी यही दूरदृष्टि है। पौराणिक कथाओं में सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है। सूर्य के बगैर इस जगत में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पृथ्वीवासियों के लिए सूर्य ही एकमात्र प्रत्यक्ष देव हैं। इसीलिए सभी धर्मो के अनुयायी किसी न किसी रूप में सूर्य की पूजा करते हैं।
स्कंदपुराण के काशी खंड में वर्णित प्रसंग के अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा सूर्य की गर्मी को सहन नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने इससे बचने के लिए अपने तप से अपने ही रूप-रंग और शक्ल की स्त्री छाया बनाई और उससे प्रार्थना की कि वह सूर्य के साथ रहे और सूर्य को यह भेद न दे कि संज्ञा सूर्य से दूर है और छाया संज्ञा की हमशक्ल है। छाया से सूर्य को दो पुत्र और एक पुत्री प्राप्त हुए। उनमें से एक शनि हैं।
शनि महात्म्य के अनुसार शनि का जन्म होते ही उनकी दृष्टि पिता सूर्य पर पड़ी। परिणामस्वरूप तत्काल ही सूर्य कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। उनका सारथी अरुण पंगु हुआ और उनके घोड़े अंधे हो गए। इस प्रकार सूर्य ने महसूस किया कि शनि की दृष्टि महाविनाशकारी है। सूर्य ने अपने गुणों और अपने पुत्र शनि के गुणों की तुलना की और महसूस किया कि कुछ गड़बड़ है। सूर्य ने छाया को प्रताड़ित किया।
यह शनि को सहन नहीं हुआ और शनि सूर्य के परम शत्रु हो गए। यद्यपि सूर्य शनि से बैर भाव नहीं रखते हैं। पिता सूर्य से बदला लेने के लिए शनि ने शिवजी को अपना गुरु बनाया और उनकी तपस्या कर किसी का भी अनिष्ट करने की शक्ति का वरदान प्राप्त कर लिया। भगवान शिव ने शनि की भक्ति से प्रसन्न होकर शनि को न्यायाधीश बनाया और वरदान दिया कि शनि व्यक्ति के कर्मो के अनुसार अच्छे कर्मो के लिए व्यक्ति की उन्नति करेंगे और बुरे कर्मो के लिए उसे प्रताड़ित भी कराएंगे।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य वर्षर्पयत मेष से लेकर मीन तक एक-एक माह की अवधि के लिए सभी राशियों में भ्रमण करते हैं। १४ जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर और कुंभ राशियां सूर्य के पुत्र शनि की राशियां हैं और शनि सूर्य से बैर रखता है।
दुश्मन की राशि मकर में सूर्य के प्रवेश करने और अगले दो महीनों के लिए शनि की मकर और कुंभ राशियों में सूर्य के रहने से और पिता-पुत्र में बैर भाव स्थिति से पृथ्वीवासियों पर किसी प्रकार का कुप्रभाव न पड़े, इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने तीर्थ स्नान, दान और धार्मिक कर्मकांड के उपाय सुझाए हैं। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ से बने लड्डुओं का उपयोग करने और उसके दान के पीछे भी यही मंशा है।
ज्योतिष के अनुसार तेल शनि का और गुड़ सूर्य का खाद्य पदार्थ है। तिल तेल की जननी है, यही कारण है कि शनि और सूर्य को प्रसन्न करने के लिए इस दिन लोग तिल-गुड़ के व्यंजनों का सेवन करते हैं। तीर्थो पर स्नान और दान-पुण्य की व्यवस्था भी इसी उद्देश्य से रखी गई है कि पिता-पुत्र के बैर भाव से इस जगत के निवासियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े और भगवान उसे किसी भी बुरी स्थिति से बचाएं।
सूर्य राज, सम्मान और पिता का कारक ग्रह हैं और शनि न्याय और प्रजा का कारक है। जन्म पत्रिका में सूर्य शनि की युति अथवा दृष्टि संबंध से ही पितृ दोष उत्पन्न होता है। लकवा और सिरदर्द जैसे रोगों से पीड़ित लोगों के लिए इस दिन दान-पुण्य वरदान माना गया है। ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव के आधार पर यह व्यवस्थाएं आमजन के लिए प्रतिपादित की हैं। उन्होंने ग्रहों के प्रकोप और उनकी शांति के उपाय भी बताए हैं।
मकर संक्रांति के दिन से लोग मलमास के बंधन से मुक्त हो जाएंगे। विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्यो के लिए लोगों को इस दिन का बेताबी से इंतजार रहता है। ज्योतिष शास्त्र में मलमास के दौरान शुभ कार्य अनिष्ट कारक माने जाते हैं। मकर संक्रांति से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाते हैं।
भारत में मकर संक्रान्ति के विविध रूप
संपूर्ण भारत में मकर संक्रांति विभिन्न रूपों में मनाया जाता है।
हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जलाता है। उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से 'दान का पर्व' है समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगता है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। बंगाल में गंगासागर में प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता है। कहा जाता है-`सारे तीरथ बार बार लेकिन गंगा सागर एक बार। तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। असम में मकर संक्रांति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं। राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। अत: मकर संक्रांति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है।
Thursday, January 13, 2011
Wednesday, November 10, 2010
छठ पूजा कब और कैसे मनाएं
छठ पूजा के इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो इसका प्रारंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। प्राचीन काल में इसे बिहार और उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता था। लेकिन आज इस प्रान्त के लोग विश्व में जहाँ भी रहते हैं वहाँ इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाते हैं।
छठ का पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसे छठ से दो दिन पहले चौथ के दिन शुरू करते हैं जिसमें दो दिन तक व्रत रखा जाता है। इस पर्व की विशेषता है कि इसे घर का कोई भी सदस्य रख सकता है तथा इसे किसी मन्दिर या धार्मिक स्थान में न मना कर अपने घर में देवकरी ( पूजा-स्थल) व प्राकृतिक जल राशि के समक्ष मनाया जाता है। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के लिए महिलाएँ कई दिनों से तैयारी करती हैं इस अवसर पर घर के सभी सदस्य स्वच्छता का बहुत ध्यान रखते हैं जहाँ पूजा स्थल होता है वहाँ नहा धो कर ही जाते हैं यही नही तीन दिन तक घर के सभी सदस्य देवकरी के सामने जमीन पर ही सोते हैं।
पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, केले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ ( बिहार में इसे खजूर कहते हैं। यह बाजरे के आटे और गुड़ व तिल से बने हुए पुए जैसा होता है), नारियल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, नारियल, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/ पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख कर दूसरे दिन आने वाले व्रत की तैयारी करती हैं।
छठ पर्व पर दूसरे दिन पूरे दिन व्रत ( उपवास) रखा जाता है और शाम को गन्ने के रस की बखीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा ( मिट्टी के बर्तन) में बखीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। बाद में प्रसाद के रूप में बखीर का ही भोजन किया जाता है व सगे संबंधियों में इसे बाँटा जाता है।
तीसरे यानी छठ के दिन 24 घंटे का निर्जल व्रत रखा जाता है, सारे दिन पूजा की तैयारी की जाती है और पूजा के लिए एक बांस की बनी हुई बड़ी टोकरी, जिसे दौरी कहते हैं, में पूजा का सभी सामान डाल कर देवकरी में रख दिया जाता है। देवकरी में गन्ने के पेड़ से एक छत्र बनाकर और उसके नीचे मिट्टी का एक बड़ा बर्तन, दीपक, तथा मिट्टी के हाथी बना कर रखे जाते हैं और उसमें पूजा का सामान भर दिया जाता है। वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल कपड़े में लिपटा हुआ नारियल, पांच प्रकार के फल, पूजा का अन्य सामान ले कर दौरी में रख कर घर का पुरूष इसे अपने हाथों से उठा कर नदी, समुद्र या पोखर पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो जाए इसलिए इसे सिर के उपर की तरफ रखते हैं। पुरूष, महिलाएँ, बच्चों की टोली एक सैलाब की तरह दिन ढलने से पहले नदी के किनारे सोहर गाते हुए जाते हैं :- काचि ही बांस कै बहिंगी लचकत जाय भरिहवा जै होउं कवनरम, भार घाटे पहुँचाय बाटै जै पूछेले बटोहिया ई भार केकरै घरै जाय आँख तोरे फूटै रे बटोहिया जंगरा लागै तोरे घूम छठ मईया बड़ी पुण्यात्मा ई भार छठी घाटे जाय नदी किनारे जा कर नदी से मिट्टी निकाल कर छठ माता का चौरा बनाते हैं वहीं पर पूजा का सारा सामान रख कर नारियल चढ़ाते हैं और दीप जलाते हैं। उसके बाद टखने भर पानी में जा कर खड़े होते हैं और सूर्य देव की पूजा के लिए सूप में सारा सामान ले कर पानी से अर्घ्य देते हैं और पाँच बार परिक्रमा करते हैं। सूर्यास्त होने के बाद सारा सामान ले कर सोहर गाते हुए घर आ जाते हैं और देवकरी में रख देते हैं। रात को पूजा करते हैं। कृष्ण पक्ष की रात जब कुछ भी दिखाई नहीं देता श्रद्धालु अलस्सुबह सूर्योदय से दो घंटे पहले सारा नया पूजा का सामान ले कर नदी किनारे जाते हैं। पूजा का सामान फिर उसी प्रकार नदी से मिट्टी निकाल कर चौक बना कर उस पर रखा जाता है और पूजन शुरू होता है।
सूर्य देव की प्रतीक्षा में महिलाएँ हाथ में सामान से भरा सूप ले कर सूर्य देव की आराधना व पूजा नदी में खड़े हो कर करती हैं। जैसे ही सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है सब लोगों के चेहरे पर एक खुशी दिखाई देती है और महिलाएँ अर्घ्य देना शुरू कर देती हैं। शाम को पानी से अर्घ देते हैं लेकिन सुबह दूध से अर्घ्य दिया जाता है। इस समय सभी नदी में नहाते हैं तथा गीत गाते हुए पूजा का सामान ले कर घर आ जाते हैं। घर पहुँच कर देवकरी में पूजा का सामान रख दिया जाता है और महिलाएँ प्रसाद ले कर अपना व्रत खोलती हैं तथा प्रसाद परिवार व सभी परिजनों में बांटा जाता है।
छठ पूजा में कोशी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मां से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोशी भरी जाती है इसके लिए छठ पूजन के साथ -साथ गन्ने के बारह पेड़ से एक समूह बना कर उसके नीचे एक मिट्टी का बड़ा घड़ा जिस पर छ: दिए होते हैं देवकरी में रखे जाते हैं और बाद में इसी प्रक्रिया से नदी किनारे पूजा की जाती है नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। कोशी की इस अवसर पर काफी मान्यता है उसके बारे में एक गीत गाया जाता है जिसमें बताया गया है कि कि छठ मां को कोशी कितनी प्यारी है। रात छठिया मईया गवनै अईली आज छठिया मईया कहवा बिलम्बली बिलम्बली - बिलम्बली कवन राम के अंगना जोड़ा कोशियवा भरत रहे जहवां जोड़ा नारियल धईल रहे जहंवा उंखिया के खम्बवा गड़ल रहे तहवां
छठ पूजा का आयोजन आज बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त देश के हर कोने में किया जाता है दिल्ली, कलकत्ता, मुम्बई चेन्न्ई जैसे महानगरों में भी समुद्र किनारे जन सैलाब दिखाई देता है पिछले कई वर्षों से प्रशासन को इसके आयोजन के लिए विशेष प्रबंध करने पड़ते हैं। इस पर्व की महत्ता इतनी है कि अगर घर का कोई सदस्य बाहर है तो इस दिन घर पहुँचने का पूरा प्रयास करता है। मात्र दिल्ली से इस वर्ष 6 लाख लोग छठ के अवसर पर बिहार की तरफ गए। देश के साथ-साथ अब विदेशों में रहने वाले लोग अपने -अपने स्थान पर इस पर्व को धूम धाम से मनाते हैं। पटना में इस बार कई लोगों ने नए प्रयोग किए जिसमें अपने छत पर छोटे स्वीमिंग पूल में खड़े हो कर यह पूजा की उनका कहना था कि गंगा घाट पर इतनी भीड़ होती है कि आने जाने में कठिनाई होती है और सुचिता का पूरा ध्यान नहीं रखा जा सकता। लोगों का मानना है कि अपने घर में सफाई का ध्यान रख कर इस पर्व को बेहतर तरीके से मनाया जा सकता है |
Wednesday, November 3, 2010
दिवाली कब मनाएं
धनतेरस इस बार दो दिन है। 3 नवंबर को शाम 6:30 बजे से 4 नवंबर की शाम 4 बजे तक धनतेरस तिथि है। इसके बाद चौदस की तिथि है। 5 नवंबर को इस बार सुबह चौदस है और दोपहर बाद कार्तिक मास की अमावस्या।
धनतेरस और दीपावली प्रदोषव्यापिनी और चौदस ऊषाकाल व्यापिनी है। धनतेरस के दोनों दिन खरीदी के शुभ योग हैं। पहले दिन बुधवार है तो दूसरे दिन गुरुवार को दिन भर सर्वार्थसिद्धि योग है।
धनतेरस और दीपावली प्रदोषव्यापिनी और चौदस ऊषाकाल व्यापिनी है। धनतेरस के दोनों दिन खरीदी के शुभ योग हैं। पहले दिन बुधवार है तो दूसरे दिन गुरुवार को दिन भर सर्वार्थसिद्धि योग है।
चूंकि त्रयोदशी और दीपावली प्रदोषव्यापिनी है, इस लिहाज से शाम को धनतेरस और दीपावली का दीपदान होगा। चतुर्दशी में स्नान और पण्य दान सुबह होता है। पंचांग और रीति रिवाज भी ऐसे ही हैं। चू्कि चतुर्दशी को स्नान और पुण्य दान सुबह होता है, लिहाजा 5 नवंबर की सुबह चतुर्दशी स्नान करना ठीक होगा। दोपहर 1.01 बजे से अमावस्या तिथि लग रही है।
धनतेरस - 3 व 4 नवंबर को
आप मनाएं- 3 नवंबर को
कारण - 3 नवंबर की शाम 7 बजे त्रयोदशी तिथि लगेगी। यह त्योहार प्रदोषव्यापिनी है। निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार तीन नवंबर को ही यह त्योहार मनाया जाना ठीक है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति पर विद्वान निर्णय सिंधु ग्रंथ और परंपरा दोनों का ख्याल रखते हैं।
नरक चौदस - 4 और 5 नवंबर को
आप मनाएं - 5 नवंबर को
कारण - चतुर्दशी तिथि 4 नवंबर की शाम 4 बजे से 5 नवंबर की दोपहर 1.01 बजे तक है। यह त्योहार ऊषाकाल व्यापिनी है। निर्णय सिंधु के अनुसार 5 नवंबर को नरक चौदस का स्नान और दान करना ठीक है।
दीपावली :- 5 और 6 नवंबर को
आप मनाएं :- 5 नवंबर को
कारण - 5 नवंबर को दोपहर एक बजे के बाद अमावस्या तिथि लगेगी। यह त्योहार प्रदोषव्यापिनी है। शाम को दीपदान करने की परंपरा है। अत: दीपावली 5 नवंबर को मनाना ही शास्त्र सम्मत है।
धनतेरस - 3 व 4 नवंबर को
आप मनाएं- 3 नवंबर को
कारण - 3 नवंबर की शाम 7 बजे त्रयोदशी तिथि लगेगी। यह त्योहार प्रदोषव्यापिनी है। निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार तीन नवंबर को ही यह त्योहार मनाया जाना ठीक है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति पर विद्वान निर्णय सिंधु ग्रंथ और परंपरा दोनों का ख्याल रखते हैं।
नरक चौदस - 4 और 5 नवंबर को
आप मनाएं - 5 नवंबर को
कारण - चतुर्दशी तिथि 4 नवंबर की शाम 4 बजे से 5 नवंबर की दोपहर 1.01 बजे तक है। यह त्योहार ऊषाकाल व्यापिनी है। निर्णय सिंधु के अनुसार 5 नवंबर को नरक चौदस का स्नान और दान करना ठीक है।
दीपावली :- 5 और 6 नवंबर को
आप मनाएं :- 5 नवंबर को
कारण - 5 नवंबर को दोपहर एक बजे के बाद अमावस्या तिथि लगेगी। यह त्योहार प्रदोषव्यापिनी है। शाम को दीपदान करने की परंपरा है। अत: दीपावली 5 नवंबर को मनाना ही शास्त्र सम्मत है।
Wednesday, October 20, 2010
Thursday, October 14, 2010
द्वादश लग्न और धनकारक ग्रह
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